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कट्टरपंथ से जुड़े 70 लोगों को अब तक गिरफ़्तार किया गया

श्रीलंका में हुए आत्मघाती हमलों में 250 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. श्रीलंकाई लोगों को यह जानकर बहुत बड़ा झटका लगा था कि उन हमलों के पीछे स्थानीय मुसलमानों का हाथ हो सकता है. साथ ही यह सवाल भी उठता है कि आखिर एक छोटे से समूह के इतने बड़े विनाशकारी कदम का पता क्यों नहीं लगाया जा सका.
इससे जुड़े सुराग जनवरी के मध्य में तब मिले थे जब श्रीलंकाई पुलिस को देश के पश्चिमी तट पर पुट्टलम ज़िले में स्थित विलपट्टु नेशनल पार्क के पास एक नारियल के बगीचे से 100 किलो विस्फोटक, 100 डेटोनेटर बरामद हुए थे.
तब पुलिस संदिग्ध इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा बुद्ध की मूर्तियों पर हमले की जांच में जुटी थी. पुलिस ने तब नवगठित ‘कट्टरपंथी मुस्लिम समूह’ के चार लोगों को गिरफ़्तार किया था.
इसके तीन महीने बाद, संदिग्ध इस्लामिक कट्टरपंथियों ने कोलंबो, नेगोंबो और पूर्वी शहर बट्टिकलोवा में 40 विदेशियों समेत 250 लोगों की निर्मम हत्या करने के लिए खुद को चर्चों और होटलों में उड़ा लिया था.
लेकिन नारियल के बगीचे में मिले विस्फ़ोटक एक मात्र ऐसी घटना नहीं थी. ये उन दिनों हुई ऐसी कई घटनाओं में से एक थी जिससे ख़तरे की घंटी बजनी चाहिए थी, खासकर तब जब ये रिपोर्ट दी गई थी कि कई श्रीलंकाई जो सीरिया में इस्लामिक स्टेट समूह में शामिल हुए थे वो घर वापस लौट आए हैं.
श्रीलंका सरकार में शीर्ष स्तर पर राजनीतिक अंतर्द्वंद्व और गुटबाजी चल रही है और यह एक बड़ा कारण है कि दी गई चेतावनियों की अनदेखी की गई, लेकिन 2009 में गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से आत्मसंतोष ने भी इसमें एक किरदार अदा किया.

तमिल अल्पसंख्यक अलगाववादियों और सरकार के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद से मुस्लिम विरोधी छिटपुट दंगों ने गुस्सा और और असंतोष पैदा किया था, लेकिन सामने ऐसा कुछ भी नहीं था जो इतने बड़े स्तर पर समन्वित हमलों की ओर इशारा करते.

श्रीलंका में ईस्टर संडे को हुए इन हमलों पर अपनी नज़र रखने वाले आतंकरोधी टीम के सदस्य कहते हैं, “इस्लामिक कट्टरपंथियों ने इन विस्फ़ोटों से न केवल सभी को हैरान किया बल्कि उन्होंने इस पूरे ऑपरेशन को गुप्त रखा.”

इसके लिए विस्तृत योजना, सुरक्षित घर, प्लानर्स और हैंडलर्स का एक व्यापक नेटवर्क, बम बनाने में विशेषज्ञता और पैसों की ज़रूरत होती- यह सब रडार पर आने से कैसे बच सका?इनमें से कुछ सवालों के जवाब मिले हैं लेकिन सुरक्षा एजेंसियों, सरकारी अधिकारियों और स्थानीय मुस्लिम नेताओं से जुड़े सूत्रों ने एक खाका खींचा है कि कैसे कई वर्षों से कट्टरपंथी और इस्लामिक स्टेट से सहानुभूति रखने वालों ने सुरक्षा बलों की नाक के नीचे ये समूह खड़ा किया.
जांचकर्ता कहते हैं कि कुछ परिवारों के लोग कट्टरपंथी बन गए और ऐसी गुटों का संचालन करने लगे.
जांच की संवेदनशीलता को देखते हुए अपनी पहचान को गोपनीय रखने का अनुरोध करते हुए आतंकरोधी एजेंट का कहना है, “इस प्रकार वो अपने इरादे और अपनी गतिविधियों को खुद तक ही सीमित रखते रहे.”
प्रत्येक इकाई एक बड़े नेटवर्क का निर्माण करते हुए अन्य कट्टरपंथी पारिवारिक समूहों के साथ संपर्क करती. माना जाता है कि ये सूचना को वफ़ादारी के साथ नेटवर्क के भीतर तक ही सीमित रखते थे.
सोशल मीडिया नेटवर्क और मैसेजिंग ऐप के ज़रिए सूचनाओं और योजनाओं को अमल में लाने में आसानी होती थी.
उन्होंने कहा, “जांचकर्ता अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि ये लोग किस तरह आपसी संवाद और आपस में तालमेल बिठाते थे.”
पूर्व जांचकर्ता ने कहा, “कट्टरपंथियों का अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए परिवारों का उपयोग करना एक नई चीज़ निकल कर सामने आई है. हमने देखा है कि कैसे इंडोनेशिया में (चर्च और पुलिस इमारत पर) हुए आत्मघाती हमलों में कुछ परिवार शामिल थे.”
माना जाता है कि कट्टरपंथ से जुड़े 70 लोगों को अब तक गिरफ़्तार किया गया है. लेकिन इसे लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है कि यह नेटवर्क ध्वस्त हो गया है.